भूगर्भ जल विभाग

उत्तर प्रदेश सरकार

भूगर्भ जल संसाधनों का परिदृश्य संक्षेप में

प्रदेश में भूजल संसाधनों का परिदृश्य

सौभाग्य से उत्तर प्रदेश का अधिकांश क्षेत्र ‘गंगा-यमुना‘ नदियों के मैदानी भूभाग के अन्तर्गत आता है, जो विश्व में भूजल के धनी भण्डारों में से एक है। विगत वर्षों में इस राज्य में जल की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भूगर्भ जल संसाधनों पर निर्भरता अत्यधिक बढ़ी है। विशेष रूप से सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक क्षेत्रों में इसका अनियोजित एवं अनियंत्रित दोहन किये जाने तथा इस सम्पदा के प्रभावी प्रबन्धन एवं नियोजन की वर्तमान में कोई समेकित व्यवस्था न होने से यह संसाधन, उपलब्धता एवं गुणवत्ता की दृष्टि से गम्भीर स्थिति में पहुँचता जा रहा है। राज्य के कई भागों, शहरी एवं ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में, भूगर्भ जल स्रोतों की उपलब्धता में चिन्ताजनक स्तर तक कमी आ गयी है।

परिदृश्य
  • उत्तर प्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है, जहाँ भूगर्भ जल सम्पदा ने प्रमुख सिंचाई साधन के रूप में एक विशिष्ट स्थान बना लिया है।
  • इसका आकलन इस तथ्य से होता है कि प्रदेश में लगभग 70 प्रतिशत सिंचित कृषि मुख्य रूप से भूगर्भ जल संसाधनों पर निर्भर है।
  • पेयजल की 80 प्रतिशत तथा औद्योगिक सेक्टर की 85 प्रतिशत आवश्यकताओं की पूर्ति भी भूगर्भ जल से ही होती है।
  • भूजल स्रोतों पर बढ़ती निर्भरता का आकलन इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2000 में प्रदेश में भूजल विकास/दोहन की दर 54.31 प्रतिशत एवं वर्ष 2009 में 72.16 प्रतिशत, वर्ष 2011 में 73.65% आंकी गयी तथा वर्ष 2013 में 73.78 प्रतिशत हो गई है।
  • लघु सिंचाई सेक्टर में 48 लाख उथले नलकूप, 49480 मध्यम नलकूप व 33510 गहरे नलकूप तथा 30917 राजकीय नलकूपों से बडे़ पैमाने पर भूजल का दोहन हो रहा है।
  • पेयजल योजनाओं के अन्तर्गत 630 शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन 5200 मिलियन लीटर तथा ग्रामीण क्षेत्रों मंे प्रतिदिन लगभग 7800 मिलियन लीटर से अधिक भूजल का दोहन किया जा रहा है।
  • परिणामस्वरूप, प्रदेश के अनेक ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में अतिदोहन की स्थिति उत्पन्न हो गयी है और यह प्राकृतिक संसाधन अनियंत्रित दोहन के साथ-साथ प्रदूषण व पारिस्थितिकीय असंतुलन के कारण गम्भीर संकट में है।
  • भूजल आकलन रिपोर्ट, 2013 के आधार पर भूजल विकास दर की दृष्टि से प्रदेश के 820 विकासखण्डों को अतिदोहित, क्रिटिकल, सेमीक्रिटिकल एवं सुरक्षित श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, जिनकी स्थिति निम्नवत है

    क्र0सं0 श्रेणी विकासखण्डों की संख्या
    1. अतिदोहित 113
    2. क्रिटिकल 59
    3. सेमीक्रिटिकल 45
    4. सुरक्षित 603
    योग 820
  • वर्ष 2000 से अतिदोहित एवं क्रिटिकल विकासखण्डों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि पायी गयी है। वर्ष 2000 के आंकलन में मात्र 22 विकासखण्ड अतिदोहित/क्रिटिकल श्रेणी में पाये गये थे, जिनकी संख्या वर्ष 2004 के आंकलन में 50 पहुँच गयी, 31 मार्च, 2009 पर आधारित नवीन आकलन के अनुसार अतिदोहित व क्रिटिकल विकासखण्डों की यह संख्या 108 पहुंच गयी तथा 31 मार्च ,2011 पर आधारित नवीन आकलन के अनुसार अतिदोहित एवं क्रिटिकल विकासखंडो की यह संख्या 179 पहुच गई तथा 31 मार्च ,2013 पर आधारित नवीन आकलन के अनुसार अतिदोहित एवं क्रिटिकल विकासखंडो की यह संख्या घटकर 172 हो गई है|
प्रदेश में संकटग्रस्त विकासखण्डों की स्थिति
विकासखण्ड की श्रेणी वर्ष-2000 वर्ष-2004 वर्ष-2009 वर्ष-2011 वर्ष-2013
अतिदोहित 2 37 76 111 113
क्रिटिकल 20 13 32 68 59
सेमीक्रिटिकल 53 88 107 82 45
योग 75 138 215 261 217